Beer Bahadur Singh
गौराबादशाहपुर/जौनपुर। जौनपुर के एक छोटे से गांव हौज के उन क्रांतिकारियों के शौर्य और पराक्रम की कहानी जानने की प्रबल जिज्ञासा लिए क्षत्रिय विकास संस्था के प्रदेश प्रभारी डा.जयसिंह राजपूत अपनी टीम प्रमोद सिंह परमार"जिला उपाध्यक्ष",ई. वीरबहादुर सिंह "जिला संगठन मंत्री",रतन सिंह परमार"वरिष्ठ समाजसेवी", अरुण कुमार शुक्ला,पवन कुमार सिंह भाऊपुर के साथ हौज की पावन धरती पर पहुंचते हैं जहां क्रांतिकारी परिवार के धरोहर महान विद्वान हिंदी,अंग्रेजी के साथ-साथ उर्दू भाषा में पारंगत बाबू चिंता हरण सिंह (मास्टर साहब) से मुलाकात होती है,जिनके मुखारविंद से क्रांतिकारियों की कहानी बयां की जाती है, जिनके पूर्वजों ने 1857 की क्रांति में अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिलाकर रख दी थी,यह कहानी उस दौर की है जब भारत देश पर अंग्रेजों का शासन हुआ करता था,उस समय अंग्रेजों की क्रूरता और अत्याचार अपनी चरम सीमा पर था,सन 1857 की क्रांति की शुरुआत मेरठ से हुई और इस क्रांति की आग पूरे देश में फैल गई,हर जगह अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह होने लगा,इस क्रांति से जौनपुर भी अछूता नहीं रहा,जौनपुर ज़िले का हौज गांव जिसे चौहान राजपूतों का गांव कहा जाता है,इस गांव में आजादी की क्रांति को लेकर हर व्यक्ति का खून खौल रहा था,गांव के पास ही अंग्रेजों की एक सैनिक टुकड़ी रहती थी, जिसका नेतृत्व सार्जेंट वुड करता था,स्थानीय लोग उसे “टूटा साहब” के नाम से पुकारते थे,क्रांतिकारी जमीदार शहीद बालदत्त सिंह के अदम्य साहस और 1857 की क्रांति के चलते अंग्रेजों को डर सताने लगा था,इसी डर के कारण उन्होंने अपनी सैनिक टुकड़ी को बनारस ले जाने की तैयारी शुरू कर दी,जब यह खबर गांव के जमींदार शहीद बालदत्त सिंह को मिली,तो उन्होंने अंग्रेजों को खत्म करने की योजना बनाई,शहीद बालदत्त सिंह परिवार के सबसे बड़े सदस्य थे,इसलिए परिवार के सभी युवक उनके साथ खड़े हो गए।
5 जून 1857 का ऐतिहासिक हमला गांव के बाहर एक पुलिया के पास शहीद बालदत्त सिंह के नेतृत्व में सभी क्रांतिकारी चौहान राजवंश के राजपूत वहां इकट्ठा हो गए और अंग्रेजों का इंतज़ार करने लगे,जैसे ही अंग्रेज अपनी सैनिक टुकड़ी लेकर वहां पहुंचे चौहान राजवंश के राजपूत भूखे शेर की तरह उन पर टूट पड़े,सबसे पहले शहीद बालदत्त सिंह ने हमला किया,फिर उनके साथियों ने अंग्रेजों पर हमला शुरू कर दिया,शहीद बालदत्त सिंह ने अंग्रेजों की ही बंदूक छीनकर सार्जेंट वुड को गोली मार दी,सार्जेंट वुड गोली लगते ही लुड़कता हुआ पुल के नीचे झाड़ी में जा गिरा,इसके बाद सभी सैनिकों को मार कर गांव से लगभग एक किलोमीटर दूर भीटा में ले जाकर 20 फीट गहरा गड्ढा खोदकर सभी को दफना दिया गया,अंग्रेजों की संख्या लगभग 25 थी,इनमें से सार्जेंट वुड को छोड़कर बाकी 24 अंग्रेजों की लाशें दफना दी गईं,मगर सार्जेंट वुड झाड़ी में छुप गया था,जिसे ढूंढते हुए अंग्रेजों ने उसकी लाश को पाया,इससे उन्हें अंदाजा लगा कि हमारे सैनिक यहीं कहीं पर मारे गए होंगे,इसके बाद अंग्रेजों ने भारी भरकम इनाम घोषित कर दिया की,जो भी सैनिकों के बारे में बतायेगा उसे इनाम दिया जाएगा,इस घटना की सूचना
पूरे पूर्वांचल में आग की तरह फैल गई,उस समय भी अपनों में गद्दारों की कमी नहीं थी, अपने ही जनपद के शिवराज तिवारी के उकसावे पर गांव का ही एक व्यक्ति बबुआ ने पैसों के लालच में आकर उप जिलाधिकारी के यहां झूठी गवाही दी,उसने कहा कि वह अपनी बहन के घर से लौट रहा था और पुल के नीचे छिपकर पूरी घटना को देखा,लेकिन अधिकारी राय हींगन साहब ने उसकी बातों पर यकीन नहीं किया और उसे भगा दिया,जब उस अधिकारी का तबादला हुआ और दूसरा अधिकारी आया तो उसने फाइल देखी तो रात में ही ढेबरी के उजाले में वारंट तैयार किया और सुबह होते-होते हौज गांव के क्रान्तिकारी परिवार के सभी लोगों को गिरफ्तार कर लिया,अंग्रेजों की अदालत में मुकदमा चला और फिर आया वो अमानवीय फैसला,जब एक ही परिवार के 15 लोगों को तीन चरणों में फांसी दी गई,शहीद बालदत्त सिंह जो पहले फरार हो चुके थे,बाद में उन्हें पकड़ लिया गया,अंग्रेजों ने उन्हें काला पानी की सजा दी, गांव की हालत और पीढ़ियों का दर्द इस घटना के बाद परिवार में केवल महिलाएं और बच्चे ही बच पाएं,फांसी पाने वाले अधिकतर युवक 20 से 25 वर्ष के थे,डर और अत्याचार के कारण परिवार के कई लोग
दूसरे जिलों में पलायन कर गए।
जिन्होंने अंग्रेजों की दलाली की,उनके तलवे चाटे,शहीद भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस,राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों की मुखवीरी करके मरवाने का काम किया,उनके केस को लड़ने से इनकार किया,उन गद्दारों की जगह-जगह प्रतिमाएं लगाई गई,आने वाली पीढ़ी को गलत इतिहास पढ़ाया गया।
मगर वहीं पर बाबू चिंताहरन सिंह के क्रांतिकारी परिवार के 16लोगों ने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी,लेकिन आज भी उनका परिवार पहचान के संकट से जूझ रहा है,न कोई सरकारी सुविधा न स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा न कोई सम्मान,अगर उन्हें सम्मान मिला होता,तो आज उनका परिवार अपनी पहचान के लिए संघर्ष नहीं कर रहा होता,जटाधारी सिंह,शहीद परिवार की पांचवीं पीढ़ी हौज गांव के ये 16 शहीद सिर्फ एक परिवार के नहीं बल्कि पूरे भारत की धरोहर हैं,अगर आपको लगता है कि इन शहीदों को उनकी पहचान मिलनी चाहिए तो शासन का ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहना पड़ रहा है कि,शहीद स्तंभ पर इनका नाम सम्मानित तरीके से लिखा जाना चाहिए और शहीद बालदत्त सिंह की प्रतिमा लगनी चाहिए,इसकी आवाज उठनी चाहिए और अगर ऐसा नहीं होता है तो यह शहीदों के सम्मान के खिलाफ है।